Vedic Astrology : Neechbhang Rajyog

Neechbhang Rajyog

When any planet is placed in its debilitated sign, then the Planet is called as “Neech Grah”, and results of such planets are normally not good. In case due to some planetary reasons this malefic influence is liquidated then such position is known as “Neech Bhang” and due to special and good results known as Neech Bhang Rajyog.

Under following conditions Neech Planet is forming Neech Bhang Rajyog :

  1. Lord of the sign in which debilitated planet is placed in the exalted sign in the horoscope and then this planet will give impact of Neech Bhang Rajyog.
  2. If Neech Grah (debilitated planet) is in conjunction with the exalted planet, debilitated planet will form Neech Bhang Rajyog.
  3. If lord of the sign of debilitated planet is positioned in own sign, in such condition this will form Neech Bhang Rajyog.
  4. According to Phaldeepika, if lord of debilitated planet will give full aspect on debilitated planet, in such condition debilitated planet will give impact of Neech Bhang Rajyog. In case planet is placed in malefic house, results may be influenced or can be minimized.

Conclusion – Normally planets involved in Neech Bhang Rajyog gives results like Exalted planets, but at times in initial stages of its period can give some disturbances but later on will give results like exalted planets.

कैसे बनी मां पार्वती नवदुर्गा … | कैसे करें नवरात्र में आदि शक्ति नवदुर्गा की पूजा अर्चना…

कैसे बनी मां पार्वती नवदुर्गा …………….

कैसे करें नवरात्र में आदि शक्ति नवदुर्गा की पूजा अर्चना………………..

मारकण्डेय पुराण के अनुसार दुर्गा अपने पूर्व जन्म में प्रजापति रक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। जब दुर्गा का नाम ‘सती ‘ था। इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवताओं को भाग लेने हेतु आमंत्रण भेजा , किन्तु भगवान शंकर को आमंत्रण नहीं भेजा।

सती के अपने पिता का यज्ञ देखने और वहां जाकर परिवार के सदस्यों से मिलने का आग्रह करते देख भगवान शंकर ने उन्हें वहां जाने की अनुमति दे दी। सती ने पिता के घर पहुंच कर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम से बातचीत नहीं कर रहा है। उन्होंने देखा कि वहां भगवान शंकर के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। पिता दक्ष ने भी भगवान के प्रति अपमानजनक वचन कहे। यह सब देख कर सती का मन ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। वह अपने पित का अपमान न सह सकीं और उन्होंने अपने आपको यज्ञ में जला कर भस्म कर लिया। अगले जन्म में सती ने नव दुर्गा के रूप धारण कर के जन्म लिया , जिनके नाम हैं: 1.शैलपुत्री 2. ब्रहमचारिणी 3. चन्द्रघंटा 4. कूष्मांडा 5. स्कन्दमाता 6. कात्यायनी 7. कालरात्रि 8. महागौरी 9. सिद्धिदात्री। …………………………..

जब देव और दानव युद्ध में देवतागण परास्त हो गये तो उन्होंने आदि शक्ति का आवाहन किया और एक एक करके उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने युद्ध भूमि में उतरकर अपनी रणनीति से धरती और स्वर्ग लोक में छाये हुए दानवों का संहार किया। इनकी इस अपार शक्ति को स्थायी रूप देने के लिए देवताओं ने धरती पर चैत्र और आश्विन मास में नवरात्रों में इन्हीं देवीयों की पूजा अर्चना करने का प्रावधान किया। वैदिक युग की यही परम्परा आज भी बरकरार है। साल में रबि और खरीफ की फसले कट जाने के बाद अन्न का पहला भोग नवरात्रों में इन्हीं देवियों के नाम से अर्पित किया जाता है। आदि शक्ति दुर्गा के इन नौ स्वरूपों को प्रतिपदा से लेकर नवमी तक देवी के मण्डपों में क्रमवार पूजा जाता है।

दुर्गा सप्तशती के अन्तर्गत देव दानव युद्ध का विस्तृत वर्णन है। इसमें देवी भगवती और मां पार्वती ने किस प्रकार से देवताओं के साम्राज्य को स्थापित करने के लिए तीनों लोकों में उत्पात मचाने वाले महादानव से लोहा लिया इसका वर्णन आता है। यही कारण है कि आज सारे भारत में हर जगह दुर्गा यानि नवदुर्गाओं के मन्दिर स्थपित हैं और साल में दो बार नौ दिन के लिए उत्तर से दक्षिण तक उत्सव का माहौल होता है। सम्पूर्ण दुर्गासप्तशती का अगर पाठ न भी कर सकें तो निम्नलिखित सप्तश्लोकी पाठ को पढ़ने से सम्पूर्ण दुर्गासप्तशती और नवदुर्गाओं के पूजन का फल प्राप्त हो जाता है।

ओम् ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति।।1।।

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभांव ददासि। दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।। 2।।

सर्वमंगलमंगलये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्रयम्बके गौरि नारायणि नमोऽतु ते।।3।।

शरणांगतदीन आर्त परित्राण परायणे सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते।। 4।।

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यारत्नाहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।।5।।

रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान् सकलानाभीष्टान्। त्यामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता श्रयतां प्रयान्ति।। 6।।

सर्वाधाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्।। 7।।

वैसे तो दुर्गा के 108 नाम गिनाये जाते हैं लेकिन नवरात्रों में उनके स्थूल रूप को ध्यान में रखते हुए नौ दुर्गाओं की स्तुति और पूजा पाठ करने का गुप्त मंत्र ब्रहमा जी ने अपने पौत्र मार्कण्डेय ऋषि को दिया। इसको देवी कवच भी कहते हैं। देवी कवच का पूरा पाठ दुर्गा सप्तशती के 56 श्लोकों के अन्दर मिलता है। नौ दुर्गाओं के स्वरूप का वर्णन ब्रहमा जी ने इस प्रकार से किया है।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रहमचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।। पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम।।। नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रहमणैव महात्मना।। अग्निना दमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमें दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः।।

उपरोक्त नौ दुर्गाओं ने देव दानव युद्ध में विशेष भूमिका निभाई है इनकी सम्पूर्ण कथा देवी भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण में लिखित है। शिव पुराण में भी इन दुर्गाओं के उत्पन्न होने की कथा का वर्णन आता है कि कैसे हिमालय राज की पुत्री पार्वती ने अपने भक्तों को सुरक्षित रखने के लिए तथा धरती आकाश पाताल में सुख शान्ति स्थापित करने के लिए दानवों राक्षसों और आतंक फैलाने वाले तत्वों को नष्ट करने की प्रतीज्ञा की ओर समस्त नवदुर्गाओं को विस्तारित करके उनके 108 रूप धारण करने से तीनों लोकों में दानव और राक्षस साम्राज्य का अन्त किया। इन नौदुर्गाओं में सबसे प्रथम देवी का नाम है शैल पुत्री जिसकी पूजा नवरात्र के पहले दिन होती है। दूसरी देवी का नाम है ब्रह्मचारिणी जिसकी पूजा नवरात्र के दूसरे दिन होती है। तीसरी देवी का नाम है चन्द्रघण्टा जिसकी पूजा नवरात्र के तीसरे दिन होती है। चौथी देवी का नाम है कूष्माण्डा जिसकी पूजा नवरात्र के चौथे दिन होती है। पांचवी दुर्गा का नाम है स्कन्दमाता जिसकी पूजा नवरात्र के पांचवें दिन होती है। छठी दुर्गा का नाम है कात्यायनी जिसकी पूजा नवरात्र के छठे दिन होती है। सातवी दुर्गा का नाम है कालरात्रि जिसकी पूजा नवरात्र के सातवें दिन होती है। आठवीं देवी का नाम है महागौरी जिसकी पूजा नवरात्र के आठवें दिन होती है। नवीं दुर्गा का नाम है सिद्धिदात्री जिसकी पूजा नवरात्र के अन्तिम दिन होती है। इन सभी दुर्गाओं के प्रकट होने और इनके कार्यक्षेत्र की बहुत लम्बी चौड़ी कथा है। लेकिन यहां हम संक्षेप में ही उनकी पूजा अर्चना का वर्णन कर सकेंगे।

 

Astrology : Dreams and their impacts

ज्योतिषीय दृष्टिकोण से निम्न स्वप्नो का अशुभ फल प्राप्त होता है :–

(१) यदि आप स्वप्न में टूटा हुआ हथियार देखते है तो इसका फल अशुभ है अर्थात जीवन साथी के मिलने में विलम्ब होगा, अगर यहीस्वप्न युवा लड़की देखती है तो भी यही फल प्राप्त होगा |

(२) यदि स्वप्न में व्यक्ति को किसी गधे की चीख सुनाई दे तो यह दुख की ओर संकेत करती है । व्यक्ति को किसी प्रकार का कोई कष्ट या विपत्ति आने की संभावना होती है ।

(३) यदि स्वप्न में किसी व्यक्ति को सांप दिखाई देते हैं तो निश्चित ही उसकी कुंडली में काल-सर्प योग होगा। सोते हुए सर्प को अपने शरीर की तरफ आते देख घबरा जाना, पानी पर तैरता हुआ सांप देखना, सांप को उड़ता हुआ देखना, सांप के जोड़े को हाथ पैरों में लिपटा हुआ देखना आदि कुंडली में काल-सर्प योग का प्रतीक होता है |
(४) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति खुद को चावल खाते देखे तो उस व्यक्ति को कई अलग-अलग सफलताएं और असफलताएं प्राप्त होती हैं। सपने में चावल दिखाई देने पर व्यक्ति को कड़ी मेहनत के बाद भी बहुत कम धन प्राप्त होता है ।
(५) यदि कोई व्यक्ति सपने में खोटी चांदी प्राप्त करता है तो इसका मतलब यही है कि निकट भविष्य में आपको धन की हानि हो सकती है। घर की सुख-समृद्धि बुरी तरह प्रभावित होगी । यदिवह व्यक्ति व्यापार करता है तो उसे हानि उठाना पड़ सकती है।

(६) यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को चांदी को गलाते हुए देखता है तो उसे अपने ही लोगों से नुकसान हो सकता है। मित्रों से बैर होने की संभावना बनेगी। चिंताएं और दुख में बढ़ोतरी होगी।

(७) यदि स्वप्न में चांदी की खान दिखाई दे तो उसे बदनामी झेलनी पड़ सकती है। इसी वजह से ऐसा सपना दिखाई देने पर सावधान रहने की आवश्यकता है ।

(८) यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को रोटी बनाता देखे, तो यह रोग का सूचक है ।

(९) वर्तमान में आप किसी खूबसूरत युवा स्त्री से प्यार कर रहे है और रात को स्वप्न में आपने देखा कि भालू आपके सामने खड़ा है तो मामला गडबड है, इसका फल आपके लिए शुभ नहीं है, क्योंकि स्वप्न में भालू को देखना इस बात का सूचक है कि आपकी प्रेमिका पर कोई दूसरा पुरुष भी डोरे डाल रहा है और वह उसकी ओर खींचती चली जा रही है जो निश्चय ही आपके लिए शुभ नहीं है |

(१०) स्वप्न में विकराल देवताओं के दर्शन , पिशाच और राक्षसी , नरक द्रश्य , बर्फ गिरते देखना अशुभ माना गया है ।
(११) स्वप्न में पानी में डूब जाना , बराती देखना , शराब पीना , सुंदर स्त्री को पाना , वृक्षों को काटना , विष खाना देखने का फल अशुभ होता है ।
(१२) स्वप्न में सिर का साफा टोपी गिरना , स्त्री से लडाई , दुबला या मोटा होना का फल शुभ परिणाम नहीं देते ।
(१३) स्वप्न में कबूतर , कौवा , गिद्ध , विद्युत , दिखाई देना , काला वस्त्र धारण करना , हंसना , अंगारे , भस्म , हंसता हुआ संन्यासी नदी का सूखना , गीत गाना , कीचड और घी का दिखना अशुभ माना गया है ।
(१४) स्वप्न में गोबर , तेल से स्नान , अग्नि में प्रवेद्गा करना , मरते हुए देखना , गडडे में गिर जाना , भूख लगना , गधे ऊंट की सवारी करना अशुभ फलदायी माना गया है ।
(१५) स्वप्न में दांतो का घिसना , खेलना , काले रंग की स्त्री से प्रेम करना , सियार , कुत्ता , बिलाव , मुर्गा , सर्प , नेवला मधुमक्खी के दर्शन मांगलिक फल प्रदान नहीं करते ।

(१६) स्वप्न में बिच्छू देखना , मीठा खाना , पर्वत , मंदिर शिखर , ध्वजा देखना सूखे वृक्ष , पुराना धन – सिक्के देखना आंधी तूफान देखना भयंकर दांत सींग वाले जानवर , विचित्र मानव , खाली आलिशन भवन , शीशे का टूटना आदि दृश्य दिखाई देने पर अशुभ फलकारक होकर रोग,भय, पीडा और चिंता प्रदान करते है ।
(१७) स्वप्न में अग्नि , राज्याभिषेक , शादी , बियाबान जंगल , सडे – गले फल , मुरझाए फूल , अंधेरा , आंधी – तूूफान , उल्लू , बाज , सियार , बिल्ली , कौआ , नंगा व्यक्ति , कुत्ते का काटना , घोडे की पीठ या छत से गिरना , झाडू देना , जेब कटना , सूर्य डूबना , महाना या तैरना , भाषण देना , दरवाजे पर ताला लगा आदि देखना अशुभ फलदायक होता है ।
(१८) स्वप्न में यदि भैस या कोई अन्य हिंसक जीव पीछा करता दिखे तो , खतरा सामने है। यदि सांप दिखे तो संकट लेकिन यदि काट ले , तो ,खूब सारी धन की प्राप्ति होती है ।

(१९) स्वप्न में यदि कुत्ता काटे या आप ऊंचाई से गिर रहे हो तो मानहानि या किसी अन्य रुप में कष्ट संभव हैं ।

(२०) आप यदि शादीशुदा एक महिला है और स्वप्न में आपने अपने पति को काला चश्मा लगाते हुये देख रही है और उनके साथ कोई काला पशु भी है तो समझ लीजिए कि आपके पति का किसी दूसरी स्त्री के साथ संबंध चल रहा है |
(२१) आप एक युवा स्त्री है और रात को स्वप्न में आप किसी खूबसूरत और भोगविलास की सुख सुविधाओं से संपन्न बैडरूम में आराम फरमा रही है तो यह स्वप्न आपके लिए शुभ नहीं है इसका मतलब यह है कि भविष्य में आपके किसी पुरुष के साथ संबंध बनने वाले है जिसके कारण आपकी इज्जत और मान सम्मान की हानि होने की संभावना रहेगी |

Astrology Prediction : Will Bhartiya Janta Party be able to Form Government

Will Bhartiya Janta Party be able to Form Government 

Bhartiya Janta Party is passing through Mahadasha of Sun, which is in the house of karma, tenth house which is a very good position for Mahadasha lord Sun, because is digbali and at very close to max. digbal position. This Sun in this house indicates that Mahadasha can give them a party in position, important position in parliament, reputation and power.

From 06-05-2014 dasha cycle is Sun/Jupiter both have exchanged their position, again very good sign and its fact that Jupiter is retrograde but Jupiter is known for providing power. Jupiter is again lord of Parliament and karma this position indicates that efforts will be in good direction to get this position.

I feel it’s a time for Bhartiya Janta Party to set direction for the coming up long period.

Dashmansha chart shows that Jupiter retrograde in Libra sign is in the house of profession may be for this holding power BJP has to seek some support from a female or in simple term we can say that a female can play an important role for BJP during this period.

This Jupiter is also indicating that after this period of 06-05-2014, BJP may get more partners and that will be a key factor for the party, it’s also possible that some of the alliances may show some differences but at last for long-term purpose this will be sorted out.

I do not think any issue related to alliances will be difficult for the party. They may get support or alliance from unexpected parties or persons.

I feel, it’s a good period for Bhartiya Janta Party.

Saat Vachan (Seven Vows) in Hindu Marriage

हिन्दू धर्म में विवाह के समय वर-वधू द्वारा सात वचन लिए जाते हैं. इसके बाद ही विवाह संस्कार पूर्ण होता है.विवाह के बाद कन्या वर से पहला वचन लेती है कि-

पहला वचन इस प्रकार है –
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तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी।।
अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या कहती है कि स्वामि तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ कर्म तुम मेरे साथ ही करोगे तभी मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हैं अर्थात् तुम्हारी पत्नी बन सकती हूं। वाम अंग पत्नी का स्थान होता है.
दूसरा वचन इस प्रकार है-
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हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्.
अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम हव्य देकर देवताओं को और कव्य देकर पितरों की पूजा करोगे तब ही मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं.
तीसरा वचन इस प्रकार है-
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कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्।।
अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम मेरी तथा परिवार की रक्षा करो तथा घर के पालतू पशुओं का पालन करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।
चौथा वचन इस प्रकार है –
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आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्।।
अर्थ – चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि तुम धन-धान्य आदि का आय-व्यय मेरी सहमति से करो तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हैं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं.
पांचवां वचन इस प्रकार है –
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देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्।।
अर्थ – पांचवे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि तुम यथा शक्ति देवालय, बाग, कूआं, तालाब, बावड़ी बनवाकर पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं.
छठा वचन इस प्रकार है –
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देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्।।
अर्थ – इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम अपने नगर में या विदेश में या कहीं भी जाकर व्यापार या नौकरी करोगे और घर-परिवार का पालन-पोषण करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं.
सातवां वचन इस प्रकार है –
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न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्।।
अर्थ – इस श्लोक के अनुसार सातवां और अंतिम वचन यह है कि कन्या वर से कहती है यदि तुम जीवन में कभी पराई स्त्री को स्पर्श नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं.

{शास्त्रों के अनुसार पत्नी का स्थान पति के वाम अंग की ओर यानी बाएं हाथ की ओर रहता है. विवाह से पूर्व कन्या को पति के सीधे हाथ यानी दाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है और विवाह के बाद जब कन्या वर की पत्नी बन जाती है जब वह बाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है}

Astrology : Chandradhi Yog

Chandradhi Yog

When all the three auspicious planets – Jupiter, Venus and Mercury are placed in sixth, seventh and eighth house from the placement of Moon, this position is known as Chandradhiyog.

This yog is considered as an Auspicious Yog (combination).

If malefic planets are placed in sixth, seventh and eighth house position, then this position is considered to be inauspicious for the natal.

Astrology : Lagnadi Yog

Lagnadi Yog

When all the three auspicious planets – Jupiter, Venus and Mercury are placed in sixth, seventh and eighth house from ascendant, this position is known as Lagnadi Yog.

This yog is considered as an Auspicious Yog (combination).